Clinical Research Me Career Opportunity

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करियर इन क्लिनिकल रिसर्च


क्लिनिकल ट्रायल्स दवाइयों से सम्बंधित ऐसी साइंटिफिक स्टडी होती है जिसमे उनके प्रभाव, गुण, उपयोग तथा क्षमताओं का जानवरों तथा मनुष्यों पर अध्ययन किया जाता है।

ये ट्रायल दवाइयों की व्यापारिक बिक्री से पहले ही किये जाते हैं तथा इनको अलग–अलग फेजों में विभक्त किया जाता है जिनमे पहले इनको जानवरों पर तथा बाद में स्वस्थ तथा बीमार मनुष्यों पर दवा के प्रभाव तथा उसकी गुणवत्ता की जाँच के लिए किए जाते हैं।

क्लिनिकल ट्रायल्स को या तो फार्मास्यूटिकल कंपनियाँ करवाती हैं या फिर कॉन्ट्रैक्ट रिसर्च आर्गेनाइजेशन्स (CRO) अपने बिहाफ पर करवाते हैं।

किसी भी नए क्लिनिकल ट्रायल की सम्पूर्ण जिम्मेदारी क्लिनिकल ट्रायल एसोसिएट (CRA) की ही होती है तथा इसका प्रमुख काम किसी भी क्लिनिकल ट्रायल को स्थापित कर उसकी शुरुआत, मोनिटरिंग तथा सफल समाप्ति होता है।

Strictness in clinical trial field


क्लिनिकल ट्रायल को लेकर सरकार ने नियमों को काफी सख्त कर दिया है परन्तु फिर भी क्लिनिकल रिसर्च इंडस्ट्री के विकास की रफ्तार में कोई कमी नहीं आई है। यह इंडस्ट्री 17 प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ रही है।

बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के लिए नई दवाओं की खोज तथा उनके लिए परीक्षण अत्यावश्यक होते हैं अतः इस क्षेत्र में करियर के अवसर हमेशा रहने की प्रबल सम्भावना रहेगी।

यह क्षेत्र छात्रों के लिए करियर का एक बेहतर विकल्प है क्योंकि इस क्षेत्र में हर वर्ष लगभग 10 हजार से ज्यादा ट्रेंड प्रोफेशनल्स की जरूरत होती है तथा इससे बहुत कम संख्या में प्रोफेशनल्स उपलब्ध होते हैं। रिसर्च से सम्बंधित होने के कारण इस क्षेत्र में बेहतर करियर के लिए हायर डिग्री तथा फील्ड एक्सपीरियंस जरूरी समझा जाता है।

दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले में भारत में क्लिनिकल रिसर्च की लागत कम है तथा यहाँ विकसित देशों के मुकाबले में 40 से 60 प्रतिशत और विकासशील देशों की तुलना में 10 से 20 प्रतिशत तक कम खर्चा आता है।

कम लागत के कारण बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ रिसर्च के लिए भारत में काफी निवेश कर रही है तथा भारतीय कंपनियाँ भी आधुनिक तकनीकों की प्राप्ति के लिए विदेशी कंपनियों के साथ मिल कर काम कर रही है।

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क्लिनिकल रिसर्च से सम्बंधित डिग्री तथा डिप्लोमा कोर्स देशभर के विभिन्न संस्थानों में मौजूद हैं जिनमे अधिकतर स्पेशलाइज्ड कोर्स पोस्ट ग्रेजुएशन स्तर के हैं।

मेडिसिन, फार्मेसी, लाइफ साइंसेज आदि में बैचलर डिग्री प्राप्त छात्र इनमे प्रवेश ले सकते हैं। एडमिशन में प्रोफेशनल एक्सपीरियंस वाले छात्रों को वरीयता प्रदान की जाती है।

क्लिनिकल रिसर्च का अधिकतर काम फार्मास्युटिकल्स, बायोटेक और मेडिकल डिवाइसेस कंपनियाँ करती हैं। क्लिनिकल रिसर्च में ट्रेंड प्रोफेशनल्स इन कंपनियों में क्लिनिकल रिसर्च एसोसिएट, इन्वेस्टिगेटर एसोसिएट, डाटा मेनेजर, फार्माकोविजिलेंस मेनेजर, क्वालिटी कंट्रोलर आदि पदों पर काम कर सकते हैं।

कंपनियों के अलावा हॉस्पिटल्स तथा रिसर्च एंड डेवलपमेंट के क्षेत्र में भी रोजगार के अवसर प्राप्त हो सकते हैं जो कि सरकारी तथा निजी दोनों क्षेत्रों में हो सकते हैं। फार्मास्यूटिकल इंडस्ट्री में सरकारी भागीदारी कम होने के कारण इस क्षेत्र में नौकरी के अधिकतर अवसर निजी क्षेत्र में ही हैं।

इस इंडस्ट्री में ट्रेंड प्रोफेशनल्स के लिए करियर में ग्रोथ की बहुत अधिक सम्भावना होती है। क्लिनिकल रिसर्च एसोसिएट के रूप में करियर की शुरुआत करने वाले लोग 10 साल का अनुभव होने तक डायरेक्टर लेवल के पद तक पहुँच जाते हैं परन्तु बड़े पदों पर पहुँचने के लिए पीएचडी की डिग्री आवश्यक होती है।

अतः इस इंडस्ट्री में शीर्ष पदों तक पहुँचने की ख्वाइश रखने वाले लोगों को पहले डॉक्टरेट लेवल तक की पढ़ाई कम्पलीट करके फिर नौकरी में कदम रखना चाहिए क्योंकि एक बार जॉब करने के पश्चात आगे पढ़ना बहुत मुश्किल होता है।

क्लिनिकल रिसर्च में मास्टर डिग्री धारी छात्रों का शुरुआती सालाना पैकेज 4 से 5 लाख रुपए तक का होता है। कुछ वर्षों के एक्सपीरियंस के पश्चात इसमें अच्छी बढ़ोतरी हो सकती है। अधिकतर कंपनियाँ अनुभवी प्रोफेशनल्स को नियुक्त करना पसंद करती है जिसकी वजह से फ्रेशेर्स को नौकरी पाने में थोड़ी परेशानी होती है।

पैकेज मुख्यतया छात्र के अकेडमिक बैकग्राउंड पर निर्भर करता है तथा एमबीबीएस, बीडीएस या एमफार्म आदि डिग्री धारी छात्र को अधिक पैकेज पर नियुक्ति मिल सकती है।

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Ramesh Sharma
M Pharm, MSc (Computer Science), MA (History), PGDCA, CHMS

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