First Love Experience Life Long Kyon Yaad Rahta Hai?

First Love Experience Life Long Kyon Yaad Rahta Hai?


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क्यों भुलाए नहीं भूलता पहले प्यार का अहसास?


प्यार शब्द का जिक्र होते ही लैला मजनू, हीर रांझा, शीरीं फरहाद, रोमियो जुलिअट, सोहनी महिवाल, ढोला मारू आदि का नाम जुबां पर आ जाता है।

ये वो नाम हैं जो सदियों से लोगो के जहन में समाये हुए हैं और हमेशा समाये हुए रहेंगें। राधा और कृष्ण ने भी प्रेम के पथ पर अग्रसर होकर प्रेम को वो ऊँचाइयाँ दी जहाँ प्रेम को पूजा का दर्जा मिला।

आज हम राधाकृष्ण को प्रेम का साक्षात प्रतीक मानकर उनकी पूजा करते हैं। प्रेम की यही ऊँचाई मीराबाई ने छुई थी और कृष्ण प्रेम में दीवानी होकर जहर का प्याला भी पी लिया था और प्रेम के भक्ति रूप को चरितार्थ किया।

पहला पहला प्यार रोमांचक और अकल्पनीय होता है जिसका अहसास वही कर सकता है जिसको कभी प्यार हुआ हो। प्यार चाहे एक तरफा हो या दो तरफा इसकी अमिट छाप जीवन पर्यन्त ह्रदय पर अंकित हो जाती है।

जब भी कभी प्रेम का जिक्र छिड़ता है तो अनायास ही पहले प्यार के सुनहरे पल हमारी आँखों के सामने चलायमान हो जाते हैं।

प्यार की कोई उम्र, कोई जाती, कोई धर्म और कोई देश नहीं होता है। ये किसी भी बंधन को नहीं मानता है। वैसे तो प्यार किसी भी उम्र में हो जाता है परन्तु अल्हड़पन में जो प्यार होता है उसका मीठा मीठा अहसास दिल में हमेशा रहता है।

प्यार में परिपक्वता न होकर निश्छल अल्हड़ता होनी चाहिए क्योकि परिपक्व होनें पर दिल में कई तरह के संशय पैदा हो जाते हैं और ह्रदय बाल सुलभ निर्मलता खों देता है।

Why Remember First Love Experience Life Long?


आखिर प्यार क्या होता है? हमें प्यार हो गया इसका अहसास कैसे होता है? प्यार एक खूबसूरत अहसास का नाम है तथा जो दिल की तमाम सुसुप्त भावनाओं को भड़का देता है।

प्यार में एक अजीब तरह का आकर्षण, अपनापन और लगाव पैदा होने लगता है। हर वक्त किसी का इन्तजार होता है तथा इस इन्तजार में एक अजीब तरह का दर्द और मजा शामिल होता है।

किसी की एक झलक पाने का मन करता है तथा जब वो सामने हो तो दिल धक् से रह जाता है और शर्म के साथ अनोखा मीठा मीठा अहसास होनें लगता है। नजरें बचाकर कनखियों से निहारर्नें का दिल करता है।

कोई हमें बहुत भोला और मासूम लगनें लगता है तथा जिस पर तन, मन से विश्वास करनें का मन करता है। उसके लिए अगर कोई भला बुरा कहे तो खुद को बहुत बुरा लगता है।

किसी के लिए दुनिया से लड़ जाने का दिल करता है। किसी के शरीर से नहीं बल्कि किसी की आत्मा से हमें लगाव होता है अर्थात सूरत से नहीं अगर सीरत से लगाव होता है तो वही पहला पहला प्यार होता है।

प्यार के जरिये वासना की पूर्ति को प्यार नहीं कहा जाता है क्योंकि प्यार में वासना का कोई स्थान नहीं होता। प्यार दो जिस्मों का नहीं दो आत्माओं का मिलन है, यहाँ जिस्मों के मिलन का महत्त्व नगण्य होता है।

परन्तु जहाँ जिस्मो के मिलन को प्राथमिकता दी जाती है वहां प्यार का स्थान नगण्य होता है तथा प्यार का नाम लेकर केवल शारीरिक भूख शांत की जाती है। प्रेम की पूर्णता के लिए जिस्मों का मिलन होना जरूरी नहीं है।


प्रेम में शरीर एक मंदिर के समान तथा आत्मा उसकी मूरत बन जाती है जहाँ सिर्फ और सिर्फ श्रद्धा और विश्वास और पूजा का ही स्थान होता है।

दुनिया को जब प्यार का पता लग जाता है और विरोध शुरू होता है तब सारे विरोधी दुश्मन के समान प्रतीत होतें हैं। सारी दुनिया ही दुश्मन लगने लग जाती है। पहले प्यार को ज्यादातर लोग शारीरिक आकर्षण मान कर उसको नजरअंदाज करते हैं जबकि यह शारीरिक आकर्षण मात्र नहीं होता है।

शारीरिक आकर्षण की मंजिल भी सिर्फ और सिर्फ शारीरिक सम्बन्ध होते हैं और उसे प्यार नहीं कहा जा सकता है। अधिकतर शारीरिक आकर्षण किशोरावस्था में होता है।

प्यार में शारीरिक संबंधों का स्थान शादी से पहले कल्पना से भी परे होता है। प्यार में सबसे प्रमुख स्थान प्रेम पत्रों का होता है। कागज के पन्नो पर अपने दिल के हाल का सजीव चित्रण ही प्रेमपत्र होता है।

प्रेम पत्रों को मृत्यु पर्यन्त जान से भी ज्यादा संभालकर रखा जाता है। जब भी एक दूसरे की याद सताती है तो इन पत्रों के माध्यम से समीपता का अहसास किया जाता है। पुराने वक्त में प्रेम पत्रों के आदान प्रदान के लिए कबूतरों का सहारा लिया जाता था।

दुनिया के लिए प्रेम की पूर्णता शादी होती है परन्तु ऐसा सम्पूर्ण सत्य नहीं है। ऐसे बहुत से उदहारण हैं जहाँ प्रेम हुआ परन्तु शादी नहीं हुई और प्रेमी प्रेमिकाएं अमर हो गए, उनका प्रेम अमर हो गया है।

About Author

Ramesh Sharma
M Pharm, MSc (Computer Science), MA (History), PGDCA, CHMS

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