Jhunjhunu Ki Rani Sati Dadi Maa Ki Amar Kahani

Jhunjhunu Ki Rani Sati Dadi Maa Ki Amar Kahani


jhunjhunu ki rani sati dadi maa ki amar kahani, rani sati dadi mandir jhunjhunu, rani sati dadi temple jhunjhunu, rani sati mandir jhunjhunu, rani sati temple jhunjhunu, sati mata mandir jhunjhunu, sati mata mandir rajasthan, rani sati mandir rajasthan, rani sati temple rajasthan, narayani bai temple jhunjhunu, narayani bai mandir jhunjhunu, rani sati dadi mandir jhunjhunu timings, rani sati dadi mandir jhunjhunu contact number, rani sati dadi mandir jhunjhunu location, rani sati dadi mandir jhunjhunu how to reach


झुंझुनू की राणी सती दादी माँ की अमर कहानी


पौराणिक मान्यता के अनुसार जब महाभारत के युद्ध में अर्जुन पुत्र अभिमन्यु वीर गति को प्राप्त हो गए थे तब अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा ने अभिमन्यु की चिता के साथ सती होने का निर्णय लिया.

भगवान कृष्ण ने उत्तरा को सती होने से रोका, तब उत्तरा ने उनसे अगले जन्म में अभिमन्यु की पत्नी बनने की विनती की. तब भगवान कृष्ण ने उत्तरा को वरदान दिया कि उसकी यह इच्छा कलयुग में पूरी होगी और तब वह नारायणी के नाम से विख्यात होगी.

Rani sati known as narayani devi


भगवान कृष्ण के उसी वरदान के फलस्वरूप आज से सात सौ वर्षों से भी अधिक समय पूर्व उत्तरा का जन्म डोकवा (Dokwa) गाँव के सेठ गुरसामल (Gursamal) की पुत्री नारायणी (Narayani) के रूप में और अभिमन्यु का जन्म हिसार के सेठ जालीराम (Jaliram) के पुत्र तनधन (Tandhan ) के रूप में हुआ.

नारायणी बाई को बचपन में धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ युद्ध कला और घुड़सवारी की शिक्षा भी दी गई थी. बचपन से ही इनमे कई चमत्कारी शक्तियाँ नजर आती थी.

युवावस्था में नारायणी बाई का विवाह तनधन के साथ संपन्न हुआ. तनधन घोड़ों का व्यापार करते थे. इनके यहाँ राणाजी (Caretaker of Horse) नामक व्यक्ति घोड़ों की देखभाल का कार्य करता था.

jhunjhunu ki rani sati dadi maa ki amar kahani

हिसार के राजकुमार को इनके घोड़ों में से एक घोडा पसंद आ गया. उसने तनधन से घोडा देने को कहा जिसे तनधन ने ठुकरा दिया. जबरन घोड़े को ले जाने की बात पर राजकुमार और तनधन में युद्ध हुआ जिसमे राजकुमार मारा गया.

जब राजा को अपने पुत्र के मारे जाने का पता चला तो वह सेना लेकर तनधन के पास आया और उसने नारायणी के सामने तनधन की हत्या कर दी. नारायणी को क्रोध आ गया और उसने माँ दुर्गा की भाँति प्रचंड रूप धारण कर राजा और उसके सभी सैनिकों को मार डाला.


इसके पश्चात नारायणी बाई ने अपने पति के साथ सती होने का संकल्प लेकर राणाजी से इसका प्रबंध करने को कहा.

राणाजी ने नारायणी की इस इच्छा का पालन किया जिससे प्रसन्न होकर नारायणी ने राणाजी को आशीर्वाद दिया कि भविष्य में सती के नाम से पहले उसका नाम लिया जाएगा. इसी आशीर्वाद के फलस्वरूप सती के नाम के पहले राणी (रानी) लगाया जाता है.

तत्पश्चात विक्रम संवत् 1352 (1295 ईस्वी) में मंगसिर शुक्ल नवमीं के दिन नारायणी ने सती होकर देवलोक गमन किया.

About Author

Ramesh Sharma
M Pharm, MSc (Computer Science), MA (History), PGDCA, CHMS

Connect with us

Follow Us on Twitter
Follow Us on Facebook
Subscribe Our YouTube Travel Channel
Subscribe Our YouTube Healthcare Channel

Disclaimer

इस लेख में दी गई जानकारी विभिन्न ऑनलाइन एवं ऑफलाइन स्त्रोतों से ली गई है जिनकी सटीकता एवं विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है. हमारा उद्देश्य आप तक सूचना पहुँचाना है अतः पाठक इसे महज सूचना के तहत ही लें. इसके अतिरिक्त इसके किसी भी उपयोग की जिम्मेदारी स्वयं उपयोगकर्ता की ही रहेगी.

अगर आलेख में किसी भी तरह की स्वास्थ्य सम्बन्धी सलाह दी गई है तो वह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर लें.

आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं एवं कोई भी सूचना, तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार N24.in के नहीं हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति N24.in उत्तरदायी नहीं है.

0 Comments