Present Era Me Rakshabandhan Ke Festival Ka Analysis

Present Era Me Rakshabandhan Ke Festival Ka Analysis


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आधुनिक युग में रक्षाबंधन के त्यौहार की विवेचना


रक्षाबंधन के त्यौहार का समाज में एक प्रमुख और विशेष स्थान है क्योंकि ये त्यौहार भाई बहन के अनूठे और पवित्र रिश्ते को एक पवित्र डोर के माध्यम से गहन मजबूती प्रदान करता है।

भाई बहन का रिश्ता वैसे ही बहुत पवित्र और मजबूत होता है लेकिन इस त्यौहार के माध्यम से हम इस रिश्ते का वो रूप देखते हैं जो दैनिक जीवन में कम देखा जाता है। रक्षाबन्धन हिन्दुओं का एक प्रमुख त्यौहार है जिसे प्रतिवर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है।

रक्षाबंधन शब्द दो शब्दों रक्षा और बंधन से मिलकर बना है अर्थात यह बंधन बहन की रक्षा से जुड़ा हुआ है। इस दिन बहन अपने भाई की लम्बी उम्र के साथ उसकी सफलता की कामना करती है तथा भाई अपनी बहन की हर हाल में रक्षा का प्रण लेकर उसे वचन देता है।

Rakshabandhan is becoming formality?


इस नए युग में जहाँ समाज में हर रिश्ता बनावटी होता जा रहा है वहाँ कम से कम अभी तक तो ये रिश्ता कुछ प्रासंगिकता रखे हुए है।

पुराने जमाने में रक्षाबंधन मनाने के लिए बहने भाई की कलाई पर रक्षासूत्र (मोली) बाँधा करती थी परन्तु अब इस रक्षासूत्र का पूर्ण रूपेण व्यावसायीकरण हो गया है।

अब इस त्यौहार पर बहुत से लोगो की जीविका निर्भर करने लग गई है तथा यह त्यौहार उनके घर को चलाने में प्रमुख भूमिका निभा रहा है।

राखी के रूप में रक्षासूत्र का प्रयोग अब नाम मात्र का ही रह गया है। इस रक्षासूत्र का स्थान बड़ी बड़ी तथा कीमती राखियों ने ले लिया है जो अब इस रिश्ते की प्रगाढ़ता का पैमाना बन गई है। अब हाथ पर कीमती राखियों के गुच्छे नजर आते है तथा उनका प्रदर्शन करने का कोई मौका गवाया नहीं जाता है।

बाजार में भिन्न भिन्न तरह की राखियों की बाढ़ सी आई होती है जिनमे कुछ पर रुपये और सिक्के तक जड़े होते हैं, कुछ राखियों पर खिलोनें तथा कुछ पर घड़ी भी लगी होती हैं। धनाढ्य वर्ग के लिए सोने चांदी की राखियाँ भी उपलब्ध होने लग गई हैं।


महँगी राखियों के साथ महँगी मिठाइयाँ होना भी जरूरी हो गया है। इस जरूरत का भरपूर फायदा मिठाई विक्रेता उठाते हैं और मिठाइयोँ की कीमते आसमान छूने लग जाती हैं।

कोई भी महँगी राखियाँ और मिठाइयाँ खरीद कर अपने रिश्ते की प्रगाढ़ता का सबूत देने में पीछे नहीं रहना चाहता। इस त्यौहार के बहाने अपने रहन सहन तथा वैभव का प्रदर्शन आम हो गया है।

वैदिक संस्कृति में रक्षाबंधन का त्यौहार मनाने के कोई साक्ष्य नहीं मिलते हैं। उस दौर में जब रक्षाबंधन के बारे में कोई नहीं जानता था तब क्या भाई बहन के रिश्तों में प्रगाढ़ता नहीं हुआ करती थी तथा क्या भाई अपनी बहनों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की बाजी नहीं लगा देते थे?

आज का दौर रिश्तों के प्रदर्शन और औपचारिकताओं का दौर है जिनमे आत्म्यिता और भावुकता का स्थान नगण्य है। हमें सम्बन्धो को औपचारिकताओं से परे रखकर निर्मल मन से निभाना चाहिए तथा किसी भी सम्बन्ध में औपचारिकताओं का कोई स्थान नहीं होना चाहिए।

जब संबंधो में दिखावटीपन आ जाता है तब वो संबंध प्रगाढ़ नहीं रह पाते फिर चाहे वो रक्त के संबंध ही क्यों न हो। हमें रक्षाबंधन इस संकल्प के साथ मनाना चाहिए कि हम भविष्य में इन सभी कमियों को दूर करके हमारे रिश्तों को नई ऊँचाई पर ले जाएंगे जहाँ हम सचमुच एक दूसरे की परवाह करे।

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Ramesh Sharma
M Pharm, MSc (Computer Science), MA (History), PGDCA, CHMS

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