Salasar Balaji Temple Salasar Churu

Salasar Balaji Temple Salasar Churu


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सालासर बालाजी मंदिर सालासर धाम चूरू


राजस्थान के चूरू जिले की सुजानगढ़ तहसील में स्थित सालासर कस्बा विश्व प्रसिद्ध बालाजी के मंदिर की वजह से सालासर धाम के रूप में परिवर्तित होकर एक धर्मनगरी के रूप में जाना जाता है.

Salasar Balaji temple location


पूरे भारत में एक मात्र सालासर में ही बालाजी का दाढ़ी मूछों वाला रूप दिखाई देता है. यह मंदिर बालाजी और भक्त मोहनदासजी की वजह से सम्पूर्ण विश्व में प्रसिद्ध है. सीकर से यहाँ की दूरी लगभग 55 किलोमीटर और जयपुर से लगभग 170 किलोमीटर है.

जयपुर से यहाँ आने के लिए सीकर होकर आना पड़ता है. सालासर बालाजी का मंदिर कस्बे के मध्य में स्थित है. मंदिर परिसर के आस पास धर्मशालाओं एवं प्रसाद की दुकानों की भरमार है.

Salasar balaji temple architecture


मंदिर का प्रवेश द्वार काफी भव्य है. द्वार से प्रवेश करते ही बाँई तरफ सामान एवं जूते रखने के लिए कक्ष बने हुए हैं. दिव्यांगजनों के लिए व्हीलचेयर की भी व्यवस्था है.

अन्दर जाने पर सामने की तरफ जाँटी के वृक्ष के पास अखंड धूणा स्थल मौजूद है. कहते हैं कि यह अखंड धूणा मोहनदासजी महाराज ने अपने हाथों से प्रज्वलित किया था.

इस प्रकार यह अखंड ज्योति मंदिर की स्थापना के समय से ही जल रही है. ऐसी मान्यता है कि इस धूणे से प्राप्त भभूति (भस्म) भक्तों के सारे कष्टों को दूर कर देती है.

धूणे के पास में बालाजी का छोटा मंदिर है जिसके दरवाजे तथा दीवारें चाँदी से बनी हुई मूर्तियों एवं चित्रों से सजी हुई हैं.

salasar balaji temple salasar churu

बताया जाता है कि इस जाँटी के वृक्ष के नीचे बैठकर भक्त मोहनदास पूजा अर्चना किया करते थे. आज भक्तजन श्रद्धास्वरुप इस जाँटी के वृक्ष पर नारियल एवं ध्वजा चढ़ाते हैं तथा लाल धागा बांधकर मन्नत मांगते हैं.

थोडा आगे जाने पर मुंडन संस्कार (जडूला) के लिए जगह बनी हुई है. इस जगह पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपने बच्चों का मुंडन संस्कार संपन्न करते हैं. आगे जाने पर श्री बालाजी मंदिर का कार्यालय स्थित है.

कार्यालय से थोड़ा आगे जाने पर बाँई तरह मुख्य मंदिर का प्रवेश द्वार है. सामने की तरफ से दर्शनार्थियों के दर्शन करके आने का रास्ता है. दाँई तरफ भक्त मोहनदासजी की समाधि की तरफ जाने का रास्ता है.

मुख्य मंदिर के दरवाजे तथा दीवारें भी हनुमान जी के छोटे मंदिर की तरह चाँदी से बनी हुई मूर्तियों एवं चित्रों से सजी हुई हैं. अन्दर से मंदिर काफी बड़ा एवं भव्य है.

चारों तरफ सोने चाँदी से सजी हुई दीवारें एवं इन पर उकेरे हुए चित्र मन को मोहित कर लेते हैं.


सामने की तरफ शालिग्राम पत्थर से निर्मित दाढ़ी मूँछ से सुशोभित बालाजी की प्रतिमा सोने के सिंहासन पर विराजमान है. इस प्रतिमा को सोने के भव्य मुकुट से सजाया गया है.

प्रतिमा के चारों तरफ सोने से सजावट की गई हैं. प्रतिमा के ऊपर सोने से निर्मित स्वर्ण छत्र भी सुशोभित है. बालाजी की प्रतिमा के ऊपरी भाग में श्री राम दरबार है.

बगल में एक तरफ गणेशजी एवं दूसरी तरफ राधा कृष्ण की प्रतिमा स्थित है. बालाजी की प्रतिमा के बगल में एक तरफ स्वयं हनुमान जी एवं दूसरी तरफ कोई संत संभवतः मोहनदासजी की प्रतिमा है.

Mohandasji Ki Samadhi, Kanhi Bai Ki Samadhi


मुख्य मंदिर के सामने के दरवाजे से कुछ आगे जाने पर दाँयी तरफ हनुमान भक्त मोहनदासजी की समाधि स्थित है. इस समाधि के पास ही इनकी बहन कान्ही बाई की समाधि भी स्थित है.

श्रावण शुक्ल नवमी को मंदिर का स्थापना दिवस बड़े धूमधाम से मनाया जाता है. साथ ही पितृपक्ष में त्रयोदशी के दिन मोहनदासजी का श्राद्ध दिवस मनाया जाता है. प्रत्येक वर्ष की चैत्र पूर्णिमा और आश्विन पूर्णिमा के दिन मेले का आयोजन होता है.

Salasar balaji mandir foundation


इस मंदिर की स्थापना मोहनदासजी महाराज ने 1754 ईस्वी (विक्रम संवत् 1811) में श्रावण शुक्ल नवमी को शनिवार के दिन की थी. बताया जाता है कि मंदिर का निर्माण करने वाले कारीगर नूर मोहम्मद और दाऊ आदि मुस्लिम धर्म से ताल्लुक रखते थे.

Who was sant Mohandasji?


प्राप्त जानकारी के अनुसार मोहनदासजी सीकर जिले के रुल्याणी ग्राम के निवासी पंडित लछीरामजी पाटोदिया के सबसे छोटे पुत्र थे. बचपन से ही इनकी रुचि धार्मिक कार्यों काफी ज्यादा थी.

इनकी बहन कान्ही का विवाह सालासर ग्राम में हुआ था तथा अपने एकमात्र पुत्र उदय के जन्म के कुछ समय पश्चात ही वे विधवा हो गई. मोहनदासजी अपनी बहन और भांजे को सहारा देने के लिए सालासर ग्राम में आकर रहने लगे.

मोहनदासजी ब्रह्मचर्य धर्म का पालन करते हुए अधिकांश समय बालाजी की भक्ति में लीन रहते थे.

इनकी भक्ति से प्रसन्न होकर बालाजी ने इन्हे एक साधू के रूप में दाढ़ी मूँछ के साथ दर्शन दिए और अपने इसी रूप में सालासर में निवास करने का वचन दिया.

अपने वचन को पूरा करने के लिए 1754 ईस्वी में नागौर जिले के आसोटा गाँव में एक किसान के खेत में बालाजी मूर्ति रूप में प्रकट हुए.

उसी रात बालाजी ने आसोटा के ठाकुर के सपने में दर्शन देकर इस मूर्ति को सालासर ले जाने के लिए कहा. दूसरी तरफ मोहनदासजी को सपने में बताया कि जिस बैलगाड़ी से मूर्ति सालासर आएगी, उसे कोई ना चलाये और जहाँ बैलगाड़ी स्वयं रुक जाए वहीं मेरी मूर्ति स्थापि‌त कर देना.

सपने में मिले आदेशानुसार बालाजी की इस मूर्ति को मंदिर में वर्तमान स्थान पर स्थापित किया गया. कहते हैं कि मोहनदासजी और बालाजी आपस में वार्तालाप करने के साथ-साथ प्राय: मल्लयुद्ध व अन्य तरह की क्रीड़ाएँ भी करते थे.

बाद में मोहनदासजी ने अपना चोला अपने भांजे उदय राम को प्रदान कर उन्हें मंदिर का प्रथम पुजारी नियुक्त किया. संवत 1850 की वैशाख शुक्ल त्रयोदशी के दिन मोहनदासजी ने जीवित समाधि लेकर स्वर्गारोहण किया.

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Ramesh Sharma
M Pharm, MSc (Computer Science), MA (History), PGDCA, CHMS

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