Valentine Day Ka Indian Culture Par Kya Effect Ho Raha Hai?

Valentine Day Ka Indian Culture Par Kya Effect Ho Raha Hai?


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वेलेंटाइन डे का भारतीय संस्कृति पर क्या असर पड़ रहा है?


कहते हैं प्रेम की ना तो कोई भाषा होती है तथा ना ही कोई बंधन होता है। भाषा तथा बंधन से मुक्त होने की वजह से प्रेम कभी भी, कहीं भी तथा किसी से भी हो सकता है।

शायद यही एक वजह है कि प्रेम प्रदर्शन के लिए "वैलेन्टाइन डे" आज एक अन्तराष्ट्रीय त्यौहार यानि ग्लोबल फेस्टिवल बन चुका है।

इस दिन की वैश्विक पहचान एक प्रेम पर्व की है। पश्चिम में प्रति वर्ष 14 फरवरी को मनाया जाने वाला यह प्रेम पर्व आज भारत में भी अपनी खासी पहचान बना चुका है।

वैलेन्टाइन डे की शुरुआत कब, क्यों और कहाँ हुई इसके बारे में पुख्ता प्रमाण नहीं है परन्तु अगर इतिहासकारों की मानें, तो यह दिवस मुख्य रूप से सैंट वैलेन्टाइन की याद में मनाया जाता है।

सैंट वैलेन्टाइन ने समाज में आपसी प्रेम तथा बंधुता को बढ़ावा दिया तथा इंसानी प्रेम को नई ऊँचाई प्रदान कर मानवता का भला किया।

प्यार का प्रतीक यह दिन सभी के लिए विशेष अहमियत रखता है। यह दिन अलग-अलग देशों में अलग-अलग तरीकों तथा अलग-अलग विश्वास के साथ मनाया जाता है। मुख्यतया पश्चिमी देशों का त्यौहार होने की वजह से उनके लिए इस दिन का महत्व कुछ खास होता है।

What is the impact of Valentine's Day on Indian culture?


इसकी अहमियत को देखते हुए इसे क्रिसमस के पश्चात दूसरा प्रमुख त्यौहार कहा जा सकता है। वैसे भी पश्चिमी देशों में कुछ गिने चुने त्यौहार ही होते हैं तथा पश्चिम का कोई भी देश भारत की तरह त्योहारों का देश नहीं है।

वैश्वीकरण का प्रभाव केवल अर्थव्यवस्थाओं पर ही नहीं पड़ा है बल्कि सभ्यता तथा संस्कृतियों पर भी पड़ा है। टेक्नोलॉजी की वजह से दुनिया बहुत छोटी हो गई है।

लगभग सभी देशों में नौकरी तथा व्यापार के लिए दूसरे देशों के नागरिक निवास करते हैं। ये लोग इन देशों की सभ्यता तथा संस्कृतियों को अपने देश में ले जाकर इनके आदान प्रदान में सहायक होते हैं।


प्रवासी लोग दो देशों को जोड़ने की कड़ी का काम करते हैं। शायद आज इसी वजह से भारत में भी क्रिसमस तथा वैलेंटाइन डे जैसे पर्व बहुत लोकप्रिय हो रहे हैं जबकि यहाँ ईसाई धर्म को मानने वाले बहुत कम संख्या में रहते हैं।

दरअसल खुशियाँ प्राप्ति का अवसर चाहे किसी भी धर्म से मिले उसे लपक लेना चाहिए। इस तनावपूर्ण तथा भागदौड़ भरी जिन्दगी में खुशियों को गवाना नहीं चाहिए। भारतीय वैसे भी बहुत सहिष्णु तथा उदार प्रकृति के लोग होते हैं। ये सभी संस्कृतियों तथा धर्मों में घुल मिल जाते हैं।

चीन में इस दिन को “नाइट्स ऑफ सेवेन्स” के रूप में मनाया जाता है तो जापान तथा कोरिया में इसे “वाइट डे” के नाम से मनाया जाता है। इस दिन लोग अपने प्यार तथा भावनाओं का इजहार एक-दूसरे को तोहफे व फूल देकर करते हैं।

पश्चिमी देशों में इस पर्व को बहुत उत्साह तथा उमंग के साथ मनाया जाता है। अमेरिका में इस दिन सार्वजनिक अवकाश होता है ताकि लोग इस दिन को अपने साथी के साथ आनंदपूर्वक तरीके से बिता सकें।

यहाँ पर इस पर्व को मनाने के लिए “वेलेंटाइन-डे” नाम से कार्डों के आदान प्रदान के साथ-साथ दिल, क्यूपिड, फूलों आदि प्रेम प्रतीकों को उपहार स्वरूप देकर अपनी भावनाओं का इजहार किया जाता है।

यूएस ग्रीटिंग कार्ड के अनुमान के अनुसार सम्पूर्ण विश्व में एक-दूसरे को प्रति वर्ष लगभग एक बिलियन वेलेंटाइन कार्ड भेजे जाते हैं तथा यह पर्व क्रिसमस के बाद दूसरा सबसे अधिक कार्ड विक्रय वाला पर्व होता है।

मूल रूप से “वेलेंटाइन डे” सैंट वेलेंटाइन के नाम पर रखकर उनकी याद में मनाया जाता है परंतु इस विषय में सटीक तथा प्रमाणिक जानकारी उपलब्ध नहीं है।

वर्ष 1969 में कैथोलिक चर्च द्वारा कुल ग्यारह सैंट वेलेंटाइन होने की पुष्टि कर उनके सम्मान में 14 फरवरी को यह पर्व मनाने की घोषणा की। इन सभी ग्यारह वैलेंटाइन में से रोम के सैंट वेलेंटाइन सबसे महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

वर्ष 1260 में संकलित “ऑरिया ऑफ जैकोबस डी वॉराजिन” नामक पुस्तक में सैंट वेलेंटाइन का वर्णन मिलता है। इसके अनुसार तीसरी शताब्दी में रोम में सम्राट क्लॉडियस का शासन था।

सम्राट ने सैनिकों तथा अधिकारियों के विवाह करने पर पूर्णतया रोक लगा दी क्योंकि उनका मानना था कि विवाह करने से पुरुषों की शक्ति और बुद्धि दोनों कम होती है।

वैलेंटाइन एक पादरी थे। उन्होंने सम्राट के इस आदेश का विरोध तथा उल्लंघन करते हुए कई सैनिकों और अधिकारियों के गुप्त विवाह संपन्न करवाए।

जब सम्राट को इस बारे में सूचना मिली तो उन्होंरने अपने आदेश की अवहेलना करने के लिए दंड स्वरूप वैलेंटाइन को फांसी की सजा दी।

ऐसा माना जाता है कि 269 ईस्वी में 14 फरवरी के दिन वैलेंटाइन को फांसी पर चढ़ा दिया गया। तभी से ही उनकी स्मृति में प्रति वर्ष 14 फरवरी को प्रेम दिवस मनाया जाता है। वेलेंटाइन डे के बहाने पूरे विश्व में निःस्वार्थ प्रेम का संदेश फैलाया जाता है।

यह भी कहा जाता है कि सैंट वेलेंटाइन ने अपनी मृत्यु के समय जेलर की नेत्रहीन बेटी जैकोबस को एक पत्र लिखा जिसमें अंत में उन्होंने 'तुम्हारा वेलेंटाइन' लिखा था।

आज इसी परिपाटी का पालन करते हुए प्रेमी अपनी प्रेयसियों को भेजे जाने वाले कार्ड में “तुम्हारा वैलेंटाइन” अवश्य लिखते हैं।

धीरे-धीरे इस पर्व का आयोजन एक दिन से बढ़कर साप्ताहिक हो गया है तथा इसे वैलेंटाइन वीक का नाम दे दिया गया है।

वैलेंटाइन वीक के अंतर्गत 7 फरवरी को रोज डे, 8 फरवरी को प्रोपोज डे, 9 फरवरी को चॉकलेट डे, 10 फरवरी को टेडी डे, 11 फरवरी को प्रॉमिस डे, 12 फरवरी को हग डे, 13 फरवरी को किस डे और अंत में 14 फरवरी को वैलेंटाइन डे मनाते हैं।

भारतीय परिप्रेक्ष्य में वैलेंटाइन डे का महत्व सिर्फ और सिर्फ सभ्यता तथा संस्कृति के खिलाफ माना जाता है। यहाँ इसे व्याभिचार फैलाने का जरिया मात्र ही समझा जाता है।

दरअसल भारतीय समाज में आलिंगन तथा चुम्बन को खुले रूप से स्वीकार नहीं किया जाता है। लड़के तथा लड़कियों के आपसी सम्बन्ध को भी समाज तथा समाज के ठेकेदार नकारात्मक रूप से ही लेते हैं।

इसीलिए सभ्यता तथा संस्कृति के रक्षक इस दिन लठ लेकर पार्कों सहित उन सभी जगहों पर विचरण कर प्रेमी युगलों की पिटाई करने निकल पड़ते हैं जहाँ इन्हें प्रेमियों की उपस्थिति की सम्भावना नजर आती है।

सम्पूर्ण दिवस प्रेमी युगलों को परेशान किया जाता है तथा उन्हें उत्पीडित किया जाता है। कथित तौर पर ऐसा करके ये लोग सभ्यता तथा संस्कृति को बचाकर भारत माता की सेवा कर रहे होते हैं।

दो वयस्क युवाओं को साथ रहकर कुछ भी करने की स्वतंत्रता हमारा संविधान भी देता है। रक्षकों को यह समझना चाहिए कि हम लोकतान्त्रिक देश में रहते हैं न कि रोम के सम्राट क्लॉडियस के राजतन्त्र में।

हमें पता होना चाहिए कि जिस समय विश्व प्रेम की परिभाषा भी नहीं समझता था उस वक्त भारत में ऋषि वात्सायन ने कामसूत्र की रचना कर दी थी।

अजंता तथा एलोरा की मूर्तियाँ हमारे खुलेपन का वह उदहारण है जिसे देख कर आज भी दुनिया आश्चर्य करती है। जिस समय दुनिया में लोग शादियों का नाम तथा मतलब तक नहीं जानते थे उस समय भारत में शादी को पवित्र बंधन समझा जाता था।

ठीक है वैलेंटाइन डे हिंदुस्तान का मौलिक त्यौहार नहीं है परन्तु जो त्यौहार ठेकेदारों के विरोध के बावजूद इतना अधिक पनप रहा है उसे रोकना क्या जायज है?

इस क्षणभंगुर जीवन में इंसान को आनंद प्राप्ति के अवसरों को नहीं छोड़ना चाहिए तथा दो बालिग लोगों की निजता का सम्मान करते हुए उनके निर्णयों में बाधक नहीं बनना चाहिए।

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Ramesh Sharma
M Pharm, MSc (Computer Science), MA (History), PGDCA, CHMS

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