Love Ka Real Meaning Aur Importance Kya Hai?

Love Ka Real Meaning Aur Importance Kya Hai?


love ka real meaning aur importance kya hai, what is real meaning of love, importance of love, what is real love, difference between love and affection, love is necessary for intimacy

love ka real meaning aur importance kya hai

लव का रियल मीनिंग और इम्पोर्टेंस क्या है?


सृष्टि रचयिता ने जीवन चक्र चलाने के लिए हर जीव को दो रूपों में विभक्त किया है। पहला रूप नर तथा दूसरा रूप मादा का होता है।

नर तथा मादा एक दूसरे के पूरक होते हैं अर्थात एक दूसरे के बिना अधूरे होते हैं। ईश्वर ने जीवन चक्र को सरलता से चलाने के लिए नर तथा मादा के बीच नैसर्गिक स्नेह की भावना उत्पन्न कर रखी है। हर प्रजाति में यह स्नेह बखूबी परिलक्षित होता है।

वैसे तो मनुष्य में आदमी तथा औरत का रिश्ता भी नर तथा मादा के रिश्ते को ही परिलक्षित करता है परन्तु ईश्वर ने मनुष्य को भावनाएँ देकर अन्य प्राणियों से काफी अलग बनाया है। भावनाओं की वजह से आदमी तथा औरत का रिश्ता कुछ खास तथा अत्यधिक प्रेममय हो जाता है। प्रेम का प्रमुख स्त्रोत भावनाएँ ही होती है।

मनुष्य के अतिरिक्त अन्य प्राणी अपने प्रेम को प्रत्यक्ष प्रकट नहीं कर पाते हैं परन्तु मनुष्य अपने प्रेम को अपनी भावनाओं के माध्यम से भली भाँति प्रकट कर देता है।

आदमी तथा औरत के बीच रिश्ते के अनेक रूप होते है जैसे माता तथा पुत्र का, भाई तथा बहन का, पिता तथा पुत्री का आदि। परन्तु इन रिश्तों में सबसे अलग तथा सबसे महत्वपूर्ण रिश्ता होता है पति-पत्नी का रिश्ता।

यह रिश्ता इस सृष्टि के मनुष्य प्रजाति के जीवन चक्र का आधार है। इस रिश्ते में बंधे हुए दो जीवन (आदमी तथा औरत) आपसी रजामंदी से तीसरे नए जीवन को जन्म देते हैं। यह रिश्ता जीवन का आधार स्तम्भ है।


मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। मनुष्य अपने जीवन को समाज में रहकर कुछ नियम कायदों का पालन करते हुए गुजारता है। इन्ही नियम कायदों में पति पत्नी के रिश्ते की बुनियाद भी रखी गई है।

भारत जैसे पुरातन देश में यह प्रचलन लाखों वर्षों से चला आ रहा है। यहाँ पर सदियों से विवाह को प्रेम की परिणति समझा जाता है।

आदमी तथा औरत के बीच एक दूसरा रिश्ता भी होता है जिसकी परिणति विवाह ही होनी चाहिए परन्तु बहुत बार समाज के नियम कायदों की वजह से यह संभव नहीं हो पाता है। इस रिश्ते में बंधे हुए आदमी तथा औरत प्रेमी युगल कहलाते हैं। इस रिश्ते में होने वाला अहसास संसार का सबसे खूबसूरत अहसास होता है।

Love between husband and wife


ऐसा कदापि नहीं है कि पति पत्नी आपस में प्रेमी युगल की भूमिका नहीं निभा सकते हैं। दरअसल पति पत्नी तो नैसर्गिक प्रेमी युगल होते हैं बस फर्क सिर्फ मानसिकता का होता है। इंसान को सिर्फ उस चीज की चाहत तथा कद्र होती है जो उसके पास नहीं होती है। सरलता से उपलब्ध चीज की कद्र इंसान नहीं करता है।

प्रत्येक मनुष्य के जीवन में एक ऐसी उम्र आती है जब उसे अपने से विपरीत लिंग वाले मनुष्य के प्रति आकर्षण पैदा होना शुरू हो जाता है। धीरे-धीरे यह आकर्षण बढ़ते हुए प्रेम का रूप लेने लग जाता है।

यहाँ पर यह बात समझना अत्यावश्यक है कि अक्सर किशोरावस्था में कई शारीरिक बदलाओं के कारण यह आकर्षण शारीरिक होता है अर्थात लड़के लड़कियों के प्रति तथा लडकियाँ लड़कों के प्रति आकर्षित होते हैं।

यही वह अवस्था होती है जब लड़के तथा लड़कियों को सही सलाह की आवश्यकता होती है वर्ना कुसंगतियों की वजह से जीवन बर्बाद भी हो सकता है। शारीरिक सम्बन्ध बनाने की सबसे अधिक इच्छा इसी उम्र में बलवती होती है।

शारीरिक आकर्षण को प्रेम कदापि नहीं कहा जा सकता है। केवल मात्र शारीरिक सम्बन्ध बनाने की इच्छा से पैदा हुए प्रेम को भी प्रेम नहीं कहा जा सकता है।

आखिर प्रेम है क्या? पुरुष तथा स्त्री के बीच ऐसी कौनसी डोर बंध जाती है जो उन्हें एक दूसरे के लिए अपने प्राण भी न्योछावर करने को प्रेरित करती है? प्रेमी युगल एक दूसरे के लिए दुनिया की सभी हदें पार कर देते हैं? आखिर इस बात का पता कैसे चलता है कि प्रेम हो गया है?

प्रेम शारीरिक आकर्षण ना होकर ईश्वर की पूजा तथा इबादत है। प्रेम सृजन का दूसरा नाम है। प्रेम एक दूसरे के प्रति त्याग का नाम है। प्रेम एक दूसरे के प्रति भरोसे का नाम है। प्रेम दो आत्माओं का मिलन है। प्रेम मात्र शारीरिक संबंधों का नाम नहीं बल्कि एक दूसरे के अधूरेपन को मिटाने का नाम है।

प्रेम पूरकता का नाम है। प्रेम सृष्टि का आधार है। प्रेम का स्वरुप जन्मदाता का होता है। जिस प्रकार नदी अपना अस्तित्व त्यागकर सागर में समा जाती है ठीक उसी तरह प्रेम भी एक दूसरे में समाकर एकाकार होने का नाम है।

प्रेम कभी भी, कहीं भी तथा किसी से भी हो सकता है। प्रेम जात पात, ऊँच नीच, अमीरी गरीबी, रंग रूप आदि से प्रभवित नहीं होता है। यह तो मात्र भावनाओं का ज्वार भाटा होता है जो समुद्र की लहरों की भाँति हिलोरे मारता रहता है।

Love has no language


प्रेम की कोई भाषा नहीं होती है। यह मन तथा आँखों के माध्यम से बयान किया जाता है। सभी बंधनों से आजादी तथा उन्मुक्तता का नाम ही प्रेम है। कहते हैं प्यार किया नहीं जाता है, बस हो जाता है।

प्रेम पवित्र तथा पूजनीय होता है। इसकी मिसाल राधा तथा कृष्ण का अमर प्रेम है। हिन्दुओं में प्रेम की इतनी महत्ता होती है कि प्रेम के लिए, प्रेम के देवता (काम देव) का अस्तित्व माना जाता है। यहाँ वात्सायन ऋषि ने कामसूत्र के रूप में एक सम्पूर्ण ग्रन्थ की रचना कर दी थी।

अजंता एलोरा की गुफाओं सहित अनेक प्राचीन मंदिरों पर प्रेमालाप करती मूर्तियाँ प्राचीन भारत में प्रेम के अस्तित्व, अहसास तथा खुलेपन को दर्शाती हैं। भारतवासी प्रेम के मामले में कभी भी संकुचित मानसिकता के शिकार नहीं रहे।

प्रेम के प्रति नजरिये में बदलाव की अगर तुलना की जाए तो प्राचीन भारत तथा वर्तमान भारत में जमीन आसमान का अंतर आ गया है।

प्राचीन युग में जहाँ प्रेम तथा शारीरिक संबंधों को सहजता से लिया जाता था, संतानोत्पति के लिए नियोग प्रथा जैसी प्रथाओं का प्रचालन था, वहीँ अब प्रेम करना गुनाह सा बनता जा रहा है तथा नियोग जैसी बात तो सोची भी नहीं जा सकती है।

समाज शादी के पश्चात प्रेम की इजाजत देता है तथा प्रेम के पश्चात शादी की बात का विरोध करता है। प्रेम विवाह को समाज तथा इसके ठेकेदारों की शान में गुस्ताखी समझा जाता है।

जबसे मुस्लिम आक्रान्ताओं ने भारत पर आक्रमण करके इस पर शासन करना शुरू किया तभी से भारत में पर्दा प्रथा तथा प्रेम के प्रति संकीर्णता ने जन्म लिया है। एक तो ये लोग पर्दा प्रथा अपने साथ लाए दूसरे इनकी कुदृष्टि से बचने के लिए महिलाएँ तथा लडकियाँ छुपकर रहने को मजबूर हुई।

धीरे-धीरे यह एक प्रथा बन गई तथा जिसके फलस्वरूप आदमी तथा औरत के सम्बन्ध में भी बहुत बदलाव हुए। धीरे-धीरे खुलापन संकीर्णता में परिवर्तित होने लगा तथा प्रेम का प्रदर्शन बुरा समझा जाने लगा तथा यह गुप्त रखने की चीज बन गया।

हमें यह समझना होगा कि लाखों वर्षों से चली आ रही हमारी सभ्यता तथा संस्कृति एक हजार वर्षों में इतनी अधिक क्यों बदल गई? जिस प्रेम के प्रदर्शन को पवित्र समझ कर उसे मंदिरों में मूर्तियों के माध्यम से प्रदर्शित किया जाता था, आज वह शर्मनाक कैसे बन गई?

दरअसल हम भारतवासी भी अनोखे हैं। उर्वरा के प्रतीक शिवलिंग की तो पूजा करते हैं परन्तु उर्वरा के रूप को शर्मनाक समझते हैं। प्रेम के प्रति सभी को अपना नजरिया बदलना होगा क्योंकि मनुष्य का जीवन क्षणिक होता है परन्तु प्रेम नश्वर तथा शाश्वत होता है।

About Author

Ramesh Sharma
M Pharm, MSc (Computer Science), MA (History), PGDCA, CHMS

Connect with us

Follow Us on Twitter
Follow Us on Facebook
Subscribe Our YouTube Travel Channel
Subscribe Our YouTube Healthcare Channel

Disclaimer

इस लेख में दी गई जानकारी विभिन्न ऑनलाइन एवं ऑफलाइन स्त्रोतों से ली गई है जिनकी सटीकता एवं विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है. हमारा उद्देश्य आप तक सूचना पहुँचाना है अतः पाठक इसे महज सूचना के तहत ही लें. इसके अतिरिक्त इसके किसी भी उपयोग की जिम्मेदारी स्वयं उपयोगकर्ता की ही रहेगी.

अगर आलेख में किसी भी तरह की स्वास्थ्य सम्बन्धी सलाह दी गई है तो वह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर लें.

आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं एवं कोई भी सूचना, तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार N24.in के नहीं हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति N24.in उत्तरदायी नहीं है.

0 Comments