Kya Actual Me Fear Ke Baad Victory Hoti Hai?

Kya Actual Me Fear Ke Baad Victory Hoti Hai?


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kya actual me fear ke baad victory hoti hai

क्या वास्तव में डर के आगे जीत है?


डर हर इंसान के मन में समाया हुआ है. इंसान चाहे चेतन अवस्था में हो या फिर अचेतन अवस्था में, उसे किसी न किसी बात का डर हमेशा सताता रहता है.

मनुष्य का जीवन तरह-तरह के डर रुपी राक्षसों से घिरा हुआ है तथा ये राक्षस मनुष्य के मस्तिष्क में अपना स्थाई घर बना कर रहते हैं.

जब भी कभी मनुष्य मानसिक रूप से थोड़ा सा भी कमजोर होता है तब उसके मस्तिष्क में रहने वाले ये डर रुपी राक्षस उसकी बुद्धि पर हावी होने लगते हैं.

जब बुद्धि डर रुपी राक्षसों से अत्यधिक प्रभावित होकर उनके अनुसार कार्य करने लग जाती है तब इंसान सामाजिक, मानसिक, शारीरिक रूप से निर्बल होने लगता है तथा रिश्तों और समाज से कटने लगता है. डर को विज्ञान की भाषा में फोबिया कहते हैं तथा यह फोबिया किसी भी चीज का हो सकता है.

Fear is also called as phobia


फोबिया किसी नए व्यक्ति से मिलने का हो सकता है, बहुत से लोगों के सम्मुख कुछ बोलने का हो सकता है, किसी कार्य में असफलता का हो सकता है, किसी चीज को बार-बार संभालनें का हो सकता है तथा इसके और भी बहुत से कारण हो सकते हैं.

जब इंसान किसी फोबिया से ग्रसित होने लगता है तब उसका आत्मविश्वास कमजोर पड़ने लगता है. हम यह कह सकते हैं कि अधिकतर वही इंसान फोबिया से ग्रसित होते हैं जिनमे आत्मविश्वास की कमी होती है तथा जिन्हें अपने किये हुए कार्यों पर भरोसा नहीं होता है.

अगर किसी इंसान का खुद पर भरोसा नहीं होता है तब वह किसी और पर भी भरोसा नहीं कर पाता है. सफलता के लिए इंसान का किसी और पर विश्वास हो या न हो परन्तु खुद पर विश्वास करना बहुत जरूरी है.

Effect of fear on confidence


जब हम स्वयं ही अपने आप पर भरोसा नहीं करते हैं तब हम दूसरे लोगों से कैसे उम्मीद करेंगे कि वे हम पर भरोसा करें.

जैसे-जैसे हमारा खुद पर विश्वास बढ़ने लगता है वैसे-वैसे हमारे मन में स्थित डर रुपी विभिन्न राक्षस कमजोर पड़ने लगते हैं तथा अंत में एक ऐसी स्थिति आ जाती है जब हम आत्मविश्वास से ओतप्रोत हो जाते हैं और हमारे सभी डर समाप्त हो जाते हैं.

सभी तरह के डर तथा वहम हमारे मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति को एक पैमाने की तरह इंगित करते हैं तथा बताते हैं कि हम कितने स्वस्थ्य हैं.

दरअसल स्वस्थ मनुष्य का मतलब वह मनुष्य होता है जो मानसिक, शारीरिक तथा आध्यात्मिक तीनों तरह से स्वस्थ हो. अगर इन तीनों में से किसी एक में भी कोई कमजोरी या रूग्णता होती है तो मनुष्य पूर्णरूपेण स्वस्थ नहीं कहलाता है.


डर हमेशा हमारी मानसिक कमजोरी की वजह से पैदा होता है. आत्मविश्वास इंसान को हमेशा मानसिक रूप से मजबूत बनाता है. जितना अधिक आत्मविश्वास होता है उतना ही अधिक कार्य करने की क्षमता पैदा होती है.

कहते हैं कि डर के आगे जीत होती है जिसका मतलब यही होता है कि किसी भी कार्य को करने की हिम्मत होनी चाहिए सफलता अपने आप मिल जाती है.

हिम्मत का प्रमुख स्त्रोत आत्मविश्वास ही होता है. हिंदी सिनेमा की एक प्रमुख फिल्म का प्रसिद्ध संवाद है कि जो डर गया समझो मर गया. इस संवाद ने डर की तुलना मृत्यु से कर दी है मतलब कि डर-डर कर जीना मृत्यु के समान होता है.

मृत्यु का वरण जीवन में एक बार होना प्रकृति का नियम है परन्तु हम डर-डर कर नियमित रूप से उसका वरण क्यों करें?

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि डर तथा आत्मविश्वास का आपस में एक व्युत्क्रमानुपाती सम्बन्ध होता है जिसमे जब डर बढ़ता है तब आत्मविश्वास उसी अनुपात में कम हो जाता है तथा जब डर घटता है तब आत्मविश्वास उसी अनुपात में बढ़ने लगता है.

अतः हमें हमेशा आत्मविश्वास से लबरेज रहना चाहिए ताकि हम जीवन के हर मोड़ पर सफल हो सके तथा दूसरों का भी सफलता के लिए उचित मार्गदर्शन कर सके.

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Ramesh Sharma
M Pharm, MSc (Computer Science), MA (History), PGDCA, CHMS

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