Life Me Hope Aur Frustration Ke Beech Kya Relation Hai?

Life Me Hope Aur Frustration Ke Beech Kya Relation Hai?


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आशा और निराशा का जीवन से क्या सम्बन्ध है?


आशा और निराशा ऐसे शब्द है जिनका मतलब हर कोई अपने हिसाब से निकाल सकता है. इनका मानव जीवन के साथ बहुत गहरा सम्बन्ध होता है.

हर आदमी के लिए इनका पैमाना अलग-अलग होता है. हर आदमी के साथ कुछ न कुछ आशाएँ तथा निराशाएँ जुडी रहती है.

इनके बिना इंसानी जीवन की कल्पना करना भी बैमानी होता है. जब तक इंसान के जीवन में आशाएँ होती है तब तक उसे जीने के कुछ मतलब मिलते हैं अन्यथा जीवन बेमतलब हो जाता है.

Different form of hope


आशा का मतलब सीधा-सीधा उम्मीद से होता है. हर व्यक्ति को हमेशा किसी न किसी चीज की उम्मीद लगी रहती है.

जन्म से लेकर मृत्यु तक उम्मीद व्यक्ति का दामन नहीं छोड़ती है जैसे बच्चे को खिलौने की उम्मीद, विद्यार्थी को अच्छे अंक प्राप्त होने की उम्मीद, सैनिक को जंग जीतने की उम्मीद, शिक्षक को सिखाने की उम्मीद, माता-पिता को पुत्र से उम्मीद, भूखे को भोजन की उम्मीद, बेघर को घर की उम्मीद, राहगीर को मंजिल की उम्मीद, रोगी को निरोगी होने की उम्मीद, भक्त को ईश्वर के दर्शन की उम्मीद, आदि.

हमारी चाहतें तथा कामनाएँ ही हमारी उम्मीदें होती हैं. इन कामनाओं का पूर्ण होना ही हमारे जीवन का प्रमुख लक्ष्य होता है.

अधिकतर लोगों की कामनाएँ सिर्फ और सिर्फ सांसारिक सुख की प्राप्ति होती है तथा इन्हें प्राप्त करने के लिए वह चौबीसों घंटे प्रयासरत रहता है. उसके लिए इन्ही सांसारिक सुखों की प्राप्ति ही उसके जीवन का ध्येय बनकर रह जाती है.

मनुष्य मृत्यु पर्यन्त इन्ही उम्मीदों और आशाओं को पूरा करने के लिए जूझता रहता है. व्यक्ति हर वक्त इसी उधेड़बुन में लगा रहता है कि उसकी इच्छित ख्वाहिशें जल्द से जल्द पूरी हो जाए.

Unfulfilled hopes become a reason of depression


इन्ही इच्छाओं की पूर्ति के लिए वह दिन-रात प्रयत्न करता रहता है. जब उम्मीदें और ख्वाहिशें पूरी होने में किसी तरह की बाधा पैदा होने लग जाती है तब मन निराशा से भर उठता है.

आशाओं तथा निराशाओं के मध्य बहुत कम अंतर होता है. किसी भी आशा के पूर्ण होने तक मन निराशा से भरा होता है परन्तु जैसे ही हमें अपनी इच्छित सफलता का पता चलता है तब अचानक से मन प्रफुल्लित हो उठता है.

आखिर ऐसा क्यों होता है कि जब हमें कोई खुशी की खबर मिलती है तब हम खबर सुनते ही प्रसन्न हो जाते हैं तथा जब हम कोई गम की खबर सुनते हैं तब हम अचानक से दुखी हो जाते हैं?

आशाओं का सीधा सम्बन्ध सुख से होता है तथा निराशाओं का सीधा सम्बन्ध दुःख से होता है. आशाएँ हमें सुख की अनुभूति करवाती है जिसकी वजह से हम प्रसन्न रहते हैं.


निराशाएँ हमें दुःख की अनुभूति करवाती है जिसकी वजह से हम दुखी रहते हैं. इस प्रकार हम कह सकते हैं कि सुख का सम्बन्ध इच्छाओं की पूर्ति तथा दुःख का सम्बन्ध अपूर्ण इच्छाएँ होती हैं.

हर मनुष्य अपनी इच्छाओं की प्राप्ति के लिए अपने-अपने तरीके से प्रयासरत रहता है. बिना प्रयास के इच्छाओं का पूर्ण होना नामुमकिन होता है. सफल प्रयास ही हमारे इच्छित लक्ष्य को भेद सकता है.

सफलता के लिए आशावादी होना बहुत जरूरी होता है क्योंकि अधिकतर वही व्यक्ति सफल हुए हैं जिन्होंने बुरे से बुरे वक्त में भी उम्मीदों का दामन नहीं छोड़ा. जब उम्मीदें टूट जाती हैं तब मन दुखी होकर निराश हो जाता है.

निराशावादी मन को किसी भी तरह से आशावादी बनाने से ही उम्मीदें पूर्ण होती है. हमें हमारी उम्मीदें और लक्ष्य अपनी क्षमताओं के अनुरूप ही तय करने चाहिए.

क्षमताओं से अधिक लक्ष्य हमें असफल बनाकर हमारी उम्मीदों को तोड़ेगा तथा हमें दूसरे लक्ष्यों को प्राप्त करने से बाधित करेगा.

अतः हमें यह अच्छी तरह से समझना होगा कि वे कौन-कौन से सपने हैं जिन्हें पूर्ण करने की उम्मीद करनी चाहिए. हमें अपने सपनों को साकार करने के लिए कठोर परिश्रम के साथ जुट जाना चाहिए ताकि हमारी आशाएँ पूर्ण हो जाये और हम प्रसन्न रह सकें.

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Ramesh Sharma
M Pharm, MSc (Computer Science), MA (History), PGDCA, CHMS

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