Main Ladki Hun Isme Mera Kasoor Kya Hai Poem

Main Ladki Hun Isme Mera Kasoor Kya Hai Poem


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Main Ladki Hun Isme Mera Kasoor Kya Hai Poem in Hindi
मैं लड़की हूँ इसमें मेरा कसूर क्या है कविता


इस घर में आसमान से एक नई नवेली बिटिया आ गई
देखते ही देखते बहुत से चेहरों पर उदासी छा गई
माहौल कुछ ऐसा बना कि जैसे कोई बड़ा अपशकुन हुआ
ऐसा लगता है कि शायद दागदार एक माँ का आँचल हुआ
कई लोगों की सूरत तो ऐसी रोनी सी हुई
जैसे इस घर में कोई बड़ी अनहोनी हुई
किसी ने चुटकी ली कि मिठाई बाँटो घर में नया मेहमान आया है
कोई बोला कि ये तो पराया धन है और सब ऊपर वाले की माया है
कोई नवजात के पिता की तरफ देख कर सहानुभूतिपूर्वक बोला
बेचारे को भगवान ने बेटी देकर बहुत जिम्मेदारियों से तोला
नवजात की अधखुली आँखे शायद पूछ रही है
मैं लड़की हूँ इसमें मेरा कसूर क्या है?

बड़े होते होते वक्त बहुत अलग अलग रंग दिखला रहा है
मुझे बंधनों और सीमाओं में रहना है ये सिखला रहा है
ऐसा लगने लगा कि जैसे घर की दीवारें भी ये बतला रही है
तू एक लड़की है सिर्फ लड़की, तू इतना क्यों इठला रही है
तुझे नहीं है डालनी कोई आदत इठलाने की
यही बेदर्द रिवाज है इस जालिम जमानें की
तुझे जीना है इस दुनिया में सिर्फ ओरों के लिए
रहना है हमेशा खुशनुमा एक धधकता दिल लिए
न तेरी कोई इच्छाएँ न कोई ख्वाब और ख्वाहिशें होगी
तेरी चाहतें और इच्छाएँ सिर्फ गुजारिशें होंगी
अगर तू तुलना करेगी इस जीवन की अपने भाइयों से
जो उन्मुक्त और स्वच्छंद जीवन जीते है
अगर कभी शिकायत करे उनकी तरह जीने की
तो कहा जायेगा कि वो लड़के है और लड़के ऐसे ही रहते है
विस्मित आँखों में अनगिनत प्रश्न यही पूछ रहे हैं
मैं लड़की हूँ इसमें मेरा कसूर क्या है?


जब-जब मैं पढ़ना चाहूँ
सभी चाहे कि में घरेलु कामों में हाथ बटाकर
कामकाज चौका बर्तन अच्छी तरह सीख लूँ
पढ़नें से अधिक जरूरी मेरा गृह कार्य में पारंगत होना है
आखिर में तो पराया धन हूँ और मुझे अपने घर जाना है
मुझे पाला ही जाता है किसी अजनबी को सौपनें के लिए
मेरे अपनें ही तैयार होते हैं मेरे सपनों में छुरा घोंपने के लिए
में अपनी मर्जी से न बाहर जा सकती हूँ न पढ़ सकती हूँ
विवाह तो बहुत दूर की बात है न प्रेम कर सकती हूँ
बिना सहारे इधर से उधर निकल नहीं सकती
अधिकतर चारदीवारी में है मेरी दुनिया सिमटती
बेबसी से भरी व्याकुल आँखे पूछती है
मैं लड़की हूँ इसमें मेरा कसूर क्या है?

विवाह के पश्चात जब काफिला ससुराल में आ गया
दुल्हन अपने साथ क्या क्या लायी है यही प्रश्न चहुंओर छा गया
हर तरफ दायजे को देखने और उसकी मीमांसा करने का जूनून था
हर कोई दूसरे के दायजे से तुलना करने में पूरी तरह मशगूल था
बचपन से ही मुझे यही बताया गया था कि मुझे अपने घर जाना है
अब मुझे जोर शोर से इस घर में अपने घर को तलाश करना है
जैसे पिता के घर में जीना होता था मुझे ओरों के लिए
उसी की पुनरावृति मुझे ससुराल में करनी सभी के लिए
ससुराल में हर एक व्यक्ति की जी भर के सेवा करना है
उनका दिल जीत कर सद्कर्मो से जीवन को भरना है
औरत पैदा होने से लेकर मृत्यु पर्यन्त इतनी पराधीन क्यों है
हर कार्य के लिए किसी न किसी पुरुष के अधीन क्यों है
एक बहु के घायल जज्बातों से भरी आँखे यही पूँछ रही है
मैं लड़की हूँ इसमें मेरा कसूर क्या है?

Main Ladki Hun Isme Mera Kasoor Kya Hai Poem in English


About Author

Ramesh Sharma
M Pharm, MSc (Computer Science), MA (History), PGDCA, CHMS

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