Is Lifestyle Se Kabhi Koi Disease Nahi Hogi

Is Lifestyle Se Kabhi Koi Disease Nahi Hogi


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इस तरह से जीने से कभी कोई बीमारी नहीं होगी


क्या आप जानते हैं कि हमने अधिकाँश बिमारियाँ बिना वजह के सिर्फ अपनी जीवन शैली की वजह से पाल रखी है? क्या हमने कभी सोचा है कि जानवर कम बीमार क्यों पड़ते हैं, ये हमारी तरह मोटे क्यों नहीं होते?

आज हम इस सम्बन्ध में बात करेंगे कि हम बिना कोई अतिरिक्त प्रयास करे सिर्फ अपनी जीवन शैली और खान पान की वजह से बिमारियों से कोसों दूर कैसे रह सकते हैं.

ये तो हम सभी जानते ही हैं कि अभी तक ब्रह्माण्ड में ज्ञात सभी ग्रहों में से हमारी धरती ही एकमात्र ऐसा गृह है जिस पर जीवन है. हम भाग्यशाली हैं कि हमें धरती पर जीवन मिला है जिसे हम अपने मनपसंद तरीके से जीने के लिए स्वतंत्र है.

जब तक इन्सान ने तरक्की नहीं की थी तब तक वह प्रकृति के नजदीक रहकर पूरी तरह से प्राकृतिक जीवन जीता था. इंसान की जीवन शैली में मेहनत का एक प्रमुख स्थान था. सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक किसी न किसी रूप में शरीर को कार्य करना पड़ता था.

Changes in lifestyle causes disease


परन्तु जब से इंसान ने प्रगति की राह पकड़ी है तब से उसकी जीवन शैली में बहुत ज्यादा परिवर्तन आया है. नित नए आविष्कारों ने इंसानी जीवन को आलसी और विलासी बना दिया है.

हर सुविधा एक बटन दबाते ही उपलब्ध हो जाने के कारण शारीरिक श्रम समाप्त सा हो गया है. घटता शारीरिक श्रम और बढ़ते हुए आलसीपन ने हमारे स्वास्थ्य को बहुत ज्यादा प्रभावित किया है.

इस बदलती जीवन शैली में इंसान ने प्राकृतिक तरीकों से जीवन जीना छोड़कर कृत्रिम तरीकों से जीवन जीना शुरू कर दिया है.

धरती पर एक इंसान ही ऐसा जानवर है जिसने अपनी बुद्धि का प्रयोग करके सुविधाजनक जीवन अपनाया है. शायद इस बुद्धि ने ही हमें प्रकृति से दूर कर दिया है.

इंसान जब जंगली था तब उसका भोजन कंद मूल फल हुआ करता था, साँस लेने के लिए शुद्ध हवा थी अर्थात वह जो कुछ खाता पीता था तथा जहाँ वह रहता था वो सब कुछ पूर्णतया प्राकृतिक था.

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जिस प्रकार जानवर पका हुआ भोजन नहीं खाते हैं ठीक उसी प्रकार इंसान भी पका हुआ भोजन नहीं खाता था. वह ताजा तथा कच्चा भोजन ही खाता था परन्तु आधुनिक जीवन शैली में पके हुए के साथ-साथ डिब्बाबंद भोजन ही खाया जाता है.

हमें यह ध्यान रखना होगा कि पके हुए भोजन से मेरा मतलब तेल और मिर्च मसालों से भरपूर भोजन से है. हमें इसकी तुलना उबले हुए भोजन से नहीं करनी है. उबला हुआ भोजन काफी हद तक पोषक तत्वों से युक्त होता है.

यह प्रमाणित हो चुका है कि भोजन के पकने से उसके सभी पोषक तत्व काफी हद तक समाप्त हो जाते हैं. अगर भोजन पकाने में प्रेशर कूकर की सहायता ली गई है तो फिर सारे पोषक तत्वों का नष्ट होना तय है.

Always obey and follow rules of nature


जब से इंसान ने प्रकृति के नियमों को मानना छोड़कर अपने बनाये हुए नियमों के हिसाब से जीना शुरू कर दिया है तब से इन नियमों को तोड़ने का दंड भी भुगत रहा है. जानवर अभी भी प्राकृतिक नियमों का पालन कर रहे हैं इसलिए वो इंसानो से ज्यादा सुखी और संतुष्ट है.

हमें स्वस्थ रहने के लिए प्राकृतिक नियमों का पालन करना ही पड़ेगा, जब सभी जीव इन नियमों को मान रहे हैं तो फिर हम क्यों बगावत कर रहे हैं? हजारों लाखों वर्षों तक तो हमने भी इन नियमों को माना और इनके अनुसार चले परन्तु पिछली लगभग एक सदी से हमारा जीवन बहुत ज्यादा बदल गया.

प्रकृति अपने नियमों को तोड़ने का दंड किसी न किसी रूप में अवश्य देती है तथा यह दंड इंसान भी बिमारियों के रूप में झेल रहा है. बिमारियाँ इंसान को पैदा होने के साथ ही अपनी चपेट में ले लेती है तथा उसे मृत्यु पर्यन्त इनसे मुक्ति नहीं मिल पाती है.


मानव की इस विकास यात्रा तथा बेतरतीब जीवन ने उसके स्वास्थ्य को पूरी तरह से खराब कर दिया है.

आधुनिक इंसान को कम उम्र में ही चश्में का सहारा लेना पड़ रहा है, जवान होते-होते कमर का घेरा बहुत बढ़कर तोंद की शक्ल ले लेता है, घुटने दर्द करने लग जाते हैं, छोटी उम्र में ही हृदय सम्बन्धी बिमारियाँ होने लग गई है. तीस-चालीस सीढियाँ एक साथ नहीं चढ़ी जाती है और कोई चढ़ भी जाता है तो हाँफने लग जाता है.

इन सभी परिस्थितियों से बचने के लिए हमें अपनी जीवन शैली में परिवर्तन कर अधिक से अधिक प्राकृतिक तरीके से जीवन जीना होगा.

सबसे पहले हमें अपने भोजन पर ध्यान देना होगा. हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हम जो भोजन कर रहे हैं वो अधिक से अधिक कच्चा एवं ताजा हो तथा जिसमे कंद मूल फल, सब्जियाँ, सलाद आदि की मात्रा अधिक हो.

पका हुआ भोजन कम से कम ग्रहण करना है और अगर करना भी है तो उसमे तेल, मसाले तथा किसी भी प्रकार के केमिकल्स नहीं हो. भोजन ताजा ही होना चाहिए तथा भोजन करने का समय भी निश्चित होना चाहिए.

दूसरी बात यह है कि हमें अधिक से अधिक प्राकृतिक वातावरण में जीवन जीना चाहिए अर्थात अधिक से अधिक शुद्ध और ताजा वायु शरीर को मिलनी चाहिए. ऐसी जगह रहना चाहिए जहाँ पर पेड़ पौधे अधिक मात्रा में लगे हों. प्रदूषण मुक्त वायु शरीर में ऊर्जा का संचार करती है जबकि प्रदूषण युक्त वायु शरीर का नाश करती है.

जिस घर में हम रहते हैं वह चाहे कैसा भी हो परन्तु उसमे हवा और रौशनी पर्याप्त मात्रा में होनी चाहिए. जब तक सूर्य की रौशनी रहती है तब तक घर में कृत्रिम प्रकाश की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए.

लोग एक-एक इंच जमीन का उपयोग करने के चक्कर में हवा और प्रकाश को रोक देते हैं तथा घर को अँधेरी गुफानुमा बनाकर अपनी तथा अपने परिवार की सेहत के साथ खिलवाड़ करते हैं.

बंद घर में हमें शुद्ध वायु न मिलकर दूषित वायु ही बार बार मिलती रहती है जिसकी वजह से बहुत से श्वसन सम्बन्धी रोग हो जाते हैं.

तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमारे जीवन से प्राकृतिक व्यायाम की पूर्णतया समाप्ति हो गई है. प्राकृतिक व्यायाम से मेरा मतलब घरेलू कामकाज तथा पैदल चलने से है.

हमारी बदलती जीवन शैली में घरेलू कामकाज बहुत हद तक खत्म सा होता जा रहा है. इंसान घरेलू कामकाज से बचने के लिए या तो मशीनों का सहारा लेने लग गया है या फिर परिस्थितियों से समझौता करने लग गया है.

भोजन बनाने से बचने के लिए रेडीमेड और पैक्ड जंक फूड का अधिक प्रयोग करने लग गया है जिनका परिणाम भी विभिन्न बिमारियाँ ही है.

पैदल चलना एक सबसे बड़ी प्राकृतिक कसरत है जिसको सभी ने त्याग दिया है. हालात यहाँ तक बिगड़ गए हैं कि लोग दो-तीन सौ मीटर भी पैदल नहीं चलना चाहते हैं.

छोटी से छोटी दूरी भी किसी न किसी वाहन पर बैठ कर तय की जाती है परिणामस्वरूप शरीर बेडौल होने लगता है और कार्यक्षमता समाप्त सी हो जाती है.

इंसान इतना कमजोर हो गया है कि उसे अपने खुद के शरीर को लेकर चलने में भी कष्ट की अनुभूति होने लग गई है. हमें यह समझना होगा कि अधिक से अधिक पैदल चलना अच्छे स्वास्थ्य की कुंजी है.

चौथा और अंतिम कारण आजकल की भागदौड़ और चिंतायुक्त जिन्दगी है. हमारा शारीरिक स्वास्थ्य पूरी तरह से मानसिक स्वास्थ्य पर निर्भर करता है. मानसिक स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिए संतुष्ट जीवन ही एकमात्र उपाय है.

हमें यह भली भाँति समझना होगा कि हमेशा लगने वाली भूख तथा तड़प इंसान को चौबीसों घंटे बैचैन रखती है, फिर चाहे यह भूख शारीरिक हो या मानसिक. मानसिक भूख हमें तृष्णा यानि इच्छा के रूप में हमेशा परेशान करती है.

तृष्णाओं का कोई अंत नहीं होता है उनका अंत सिर्फ और सिर्फ आत्म संतुष्टि से ही हो सकता है. जो हमारे पास है उसी में हमें संतुष्ट रहना होगा. हमें बेवजह की चिंताओं से दूर रहना होगा नहीं तो इनकी वजह से हम कई प्रकार की मानसिक बिमारियों से ग्रसित हो सकते हैं.

इन सभी स्थितियों से बचने के लिए हमें जानवरों की भाँति बेफिक्र हो कर जीवन जीना चाहिए. इंसान को सिर्फ और सिर्फ एक जीवन मिलता है जिसको उसे हर परिस्थिति में आनंद के साथ जीना चाहिए.

उपरोक्त कुछ प्राकृतिक तरीकों से जीवन जीकर हम अपनी सेहत को सुधार सकते हैं तथा जीवनभर सेहतमंद रह सकते हैं.

About Author

Ramesh Sharma
M Pharm, MSc (Computer Science), MA (History), PGDCA, CHMS

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