Main Aur Mere College Ke Dost Poem

Main Aur Mere College Ke Dost Poem


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main aur mere college ke dost poem

Main Aur Mere College Ke Dost Poem in Hindi
मैं और मेरे कॉलेज के दोस्त कविता


कॉलेज के दिनों में मिले मुझे कई अनजाने अपने
सब नें साथ में मिल जुल कर देखे थे सुनहरे सपने
कॉलेज का वक्त बीता और सब का साथ छूट गया
धीरे धीरे सबका आपस में संपर्क और नाता टूट गया

गुजरते वक्त के साथ सब प्रोफेशनल होते गए
चौबीसों घंटे सब अपने प्रोफेशन में खोते गए
भूलने लगे उन दिनों को जो अब कभी न लौट पाएँगे
उम्र के एक दौर में पुरानी यादें बनकर तड़पाएँगे

धीरे धीरे मेरे साथ मेरे सभी दोस्त पकने लगे हैं
अपने सफेद और उड़ते बालों को ढकने लगे हैं
ऐसा नहीं है कि पहले किसी वजह से जागते थे रातों में
लेकिन अब रातों में बेवजह जगने लगे हैं


उम्र ऐसी आ गई कि ना बुढ़ापा है और ना जवानी है
शरीर थकने लगा है लेकिन मन में अभी भी रवानी है
पापा, चाचा, ताऊ का किरदार निभाने लग गए है मगर
'दिल तो बच्चा है जी' गाते हुए अभी भी हसरतें पुरानी है

कभी जब तन्हा होते हैं तो याद कर लेते हैं पुराने दिन
देखते देखते फुर्र से कहाँ उड़ गए वो सुनहरे पल छिन
कभी कभी मन करता है कि उस दौर में फिर से लौट जाऊँ 
सबके गले लगूँ, कुछ उनकी सुनूँ, कुछ अपनी सुनाऊँ

Main Aur Mere College Ke Dost Poem in English


college ke dinon me mile mujhe kai anjaane apne
sab ne saath me mil jul kar dekhe the sunahare sapne
college ka waqt beeta aur sab ka saath chhot gaya
dheere dheere sabka aapas me sampark aur naata toot gaya

gujarte waqt ke saath sab professional hote gaye
chaubison ghante sab apne profession me khote gaye
bhoolne lage un dinon ko jo ab kabhi na laut payenge
umra ke ek daur me purani yaden bankar tadpayenge

dheere dheere mere saath mere sabhi dost pakne lage hain
apne safed aur udte baalon ko dhakne lage hain
aisa nahi hai ki pahle kisi vajah se jaagte the raton me
lekin ab raton me bevajah jagne lage hain

umra aisi aa gai ki naa budhapa hai aur naa jawani hai
shareer thakne laga hai lekin man me abhi bhi rawani hai
papa, chacha, taau ka kirdaar nibhane lag gaye hain magar
'dil to bachcha hai ji' gaate huye abhi bhi hasraten purani hai

kabhi tanha hote hain to yaad kar lete hain purane din
dekhte dekhte furr se kahan ud gayevo sunahare pal chhin
kabhi kabhi man karta hai ki us daur me phir se laut jaun
sabke gale lagun, kuchh unki sunun, kuchh apni sunaun

About Author

Ramesh Sharma
M Pharm, MSc (Computer Science), MA (History), PGDCA, CHMS

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